Fulwari Ashram Saharanpur: स्वतंत्रता आंदोलन का ऐतिहासिक केंद्र
सहारनपुर में पांवबोई नदी के किनारे बाबा लाल दास रोड पर स्थित फुलवारी आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक बेहद खास और ऐतिहासिक स्थान रखता है। यह ऐतिहासिक परिसर उस दौर की कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय गतिविधियों का जीवंत साक्षी रहा है, जहां भारत की आजादी की लड़ाई के अलग-अलग रूप एक साथ देखने को मिलते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए अहिंसक आंदोलनों से लेकर क्रांतिकारियों की गुप्त गतिविधियों तक, फुलवारी आश्रम का गहरा जुड़ाव स्वतंत्रता संघर्ष के कई गौरवशाली अध्यायों से रहा है।

1919 में हिंदू कुमार सभा की स्थापना और सामाजिक चेतना का विस्तार
इतिहासकार एवं यूनिवर्सिटी हेरिटेज रिसर्च सेंटर 'विरासत' के समन्वयक डॉ. राजीव उपाध्याय यादव के अनुसार, स्वतंत्रता सेनानी लाला प्रसाद अख्तर ने वर्ष 1919 में सामाजिक सुधार और गौ-रक्षा के पावन उद्देश्य से 'हिंदू कुमार सभा' की स्थापना की थी। इसी ऐतिहासिक समय में फुलवारी आश्रम में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर एक विशेष मेले की शुरुआत की गई, जिसे आगे चलकर 'वीर पूजा' की परंपरा से भी जोड़ा गया। धीरे-धीरे यह आश्रम केवल सामाजिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति फैलाने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
असहयोग आंदोलन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता
फुलवारी आश्रम की ऐतिहासिक भूमिका असहयोग आंदोलन के दौर में और अधिक व्यापक हो गई। सहारनपुर में रतनलाल बाबू और मेला राम सहित अनेक निष्ठावान कार्यकर्ता इस आंदोलन से जुड़े और राष्ट्रीय धारा में पूरी तरह सक्रिय हुए। इन प्रमुख कार्यकर्ताओं के जुड़ाव और निरंतर प्रयासों से फुलवारी आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी तमाम रणनीतियों और गतिविधियों का मुख्य गढ़ बनता चला गया।
नमक सत्याग्रह और सहारनपुर में आंदोलन की ज्वाला
फुलवारी आश्रम का संबंध केवल प्रारंभिक सामाजिक आंदोलनों तक ही सीमित नहीं था। महात्मा गांधी के आह्वान पर जब अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध नमक कानून को खुली चुनौती देने का ऐतिहासिक दौर शुरू हुआ, तब फुलवारी आश्रम में भी आंदोलनकारियों की सरगर्मियां तेज हो गईं। 6 अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी द्वारा दांडी में नमक कानून तोड़े जाने के बाद पूरे देश में नमक सत्याग्रह की जबरदस्त लहर फैल गई। इसका सीधा और व्यापक असर सहारनपुर में भी देखने को मिला। 18 अप्रैल को अजित प्रसाद जैन के कुशल नेतृत्व में सहारनपुर में इस आंदोलन ने जबरदस्त जोर पकड़ा। अंग्रेजी प्रशासन ने इस जनआंदोलन को कुचलने के तमाम प्रयास किए, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों का हौसला डिगा नहीं।
गिरफ्तारियां और 26 अप्रैल का ऐतिहासिक अभियान
आंदोलन की बढ़ती ताकत को देखकर अंग्रेजी हुकूमत बौखला गई। इसके बाद 24 अप्रैल को लाला प्रसाद अख्तर और कांग्रेस के सदर मौलवी मंजूरुल नबी को 'नौजवान सभा' का जलसा आयोजित करने के आरोप में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। औपनिवेशिक प्रशासन की इस दमनात्मक कार्रवाई के बावजूद आंदोलन की गति थमी नहीं। आंदोलनकारियों ने अपनी गतिविधियां पूरी दृढ़ता से जारी रखीं और योजनाबद्ध तरीके से 26 अप्रैल से नमक कानून तोड़ने का व्यापक अभियान सहारनपुर में शुरू कर दिया गया।
श्रीकृष्ण मंदिर की गुफा और शहीद-ए-आजम भगत सिंह का गुप्त प्रवास
फुलवारी आश्रम की ऐतिहासिक अहमियत इस कारण भी अद्वितीय है कि इसका संबंध केवल गांधीवादी सत्याग्रह तक सीमित नहीं था, बल्कि यह क्रांतिकारियों की रणनीतिक शरणस्थली भी रहा। आश्रम परिसर में स्थित श्रीकृष्ण मंदिर के ऊपर बनी गुफा का उल्लेख स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में प्रमुखता से मिलता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और विवरणों के मुताबिक, शहीद-ए-आजम भगत सिंह अपने सहारनपुर प्रवास के दौरान इस गुफा में दो बार ठहरे थे। इसी सुरक्षित स्थान पर क्रांतिकारियों की अत्यंत महत्वपूर्ण और गुप्त बैठकें आयोजित की गई थीं।
ऐतिहासिक विरासत के रूप में फुलवारी आश्रम की महत्ता
इस प्रकार फुलवारी आश्रम सहारनपुर के स्वतंत्रता संघर्ष की उस गौरवमयी गाथा को सामने लाता है, जिसमें एक ही परिसर के भीतर सामाजिक सुधार, असहयोग आंदोलन, ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह और क्रांतिकारी गतिविधियों की महत्वपूर्ण कड़ियां आपस में जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। आज यह ऐतिहासिक स्थल सहारनपुर और पूरे देश के स्वतंत्रता आंदोलन की एक अनमोल धरोहर माना जाता है।