नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े आशुतोष रांका और सौरव दास को फिलहाल राहत नहीं मिली है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने 19 अक्टूबर को दोनों की हिरासत दो दिनों के लिए बढ़ा दी। अदालत के फैसले में कथित पीस बॉन्ड उल्लंघन, दोबारा प्रदर्शन किए जाने की आशंका और बचाव पक्ष की ओर से पेश किए गए जमानतियों की पात्रता अहम मुद्दे रहे।
दोनों नेताओं के वकीलों के मुताबिक, इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। वहीं, पार्टी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर मामले की जल्द सुनवाई की मांग किए जाने की जानकारी दी।
इसी मामले में सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को शनिवार को एसईएम अदालत से रिहाई मिल चुकी है। उन्हें 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रस्तावित तिरंगा प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिया गया था।

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
इस मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को हुई, जब दिल्ली पुलिस ने सीजेपी के तीन नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में लिया। पुलिस का आरोप था कि नेताओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अपील की थी, जबकि इसके लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी।
पुलिस ने आशंका जताई कि प्रस्तावित प्रदर्शन से राजधानी में कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
11 अक्टूबर को तीनों नेताओं को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। वहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 136 के तहत उन्होंने 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और जमानती बॉन्ड के जरिए एक वर्ष तक शांति बनाए रखने का आश्वासन दिया। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
यह व्यवस्था सामान्य आपराधिक जमानत से अलग है। इसमें संबंधित व्यक्ति से भविष्य में शांति भंग न करने और निर्धारित शर्तों का पालन करने का लिखित वचन लिया जाता है। इसे आमतौर पर पीस बॉन्ड कहा जाता है।
रिहाई के बाद दोबारा प्रदर्शन करने का आरोप
दिल्ली पुलिस के अनुसार, रिहाई के बाद भी प्रदर्शन से जुड़ी गतिविधियां जारी रहीं। शिकायतकर्ता सब-इंस्पेक्टर मोहित भाटी ने अदालत में दावा किया कि 13 अक्टूबर की सुबह आशुतोष रांका और सौरव दास जेडीयू कार्यालय परिसर से निकलकर जंतर-मंतर पहुंचे और वहां नारेबाजी की।
इस घटनाक्रम के बाद दोनों को दोबारा हिरासत में लिया गया। 14 अक्टूबर को एसईएम महेश कुमार मीना की अदालत ने अपने आदेश में दोनों के व्यवहार को लेकर कड़ी टिप्पणियां कीं। आदेश के मुताबिक, उनके पिछले आचरण और कथित गतिविधियों से अधिकारियों के निर्देशों का पालन नहीं करने तथा फिर से विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की आशंका सामने आई।
अदालत ने BNSS की धारा 130 के तहत कार्यवाही करते हुए दोनों को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
19 अक्टूबर को दोबारा सुनवाई के दौरान एसईएम रितु राज की अदालत ने हिरासत की अवधि दो दिन और बढ़ा दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध परिस्थितियां पीस बॉन्ड की शर्तों के जानबूझकर उल्लंघन और सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका की ओर संकेत करती हैं।

जमानतियों की पात्रता भी बनी हिरासत बढ़ने की वजह
हिरासत बढ़ाने के फैसले में जमानतियों के सत्यापन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा। अदालत के सामने बचाव पक्ष ने नए जमानती पेश किए थे, लेकिन उनकी ओर से दिए गए दस्तावेजों और जानकारियों पर सवाल उठाए गए।
अदालती आदेश के अनुसार, एक जमानती के बॉन्ड और आधार कार्ड की तस्वीरों में अंतर पाया गया। दूसरे जमानती से दास के माता-पिता के नाम और पते जैसी बुनियादी जानकारी भी नहीं मिल सकी।
अदालत ने इन कमियों को ध्यान में रखते हुए जमानतियों को स्वीकार नहीं किया। उसके अनुसार, पेश किए गए लोगों की विश्वसनीयता और अभियुक्तों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की क्षमता पर संदेह था।
इस तरह, मामले में केवल कथित पीस बॉन्ड उल्लंघन ही नहीं, बल्कि वैध और स्वीकार्य जमानती उपलब्ध कराने का सवाल भी रिहाई में बाधा बना।
कानूनी विशेषज्ञ के अनुसार, यह नियमित जमानत का मामला नहीं
सुप्रीम कोर्ट के वकील निपुण सक्सेना ने इस प्रक्रिया को BNSS के अध्याय 9 में दिए गए निवारक प्रावधानों से जुड़ा बताया। इन प्रावधानों के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट संभावित शांति भंग की स्थिति को रोकने के लिए संबंधित व्यक्ति से निर्धारित अवधि तक अच्छे आचरण या शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरवा सकता है।
उनके अनुसार, धारा 126 से 143 के बीच ऐसी कार्यवाही के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन की स्थिति में मजिस्ट्रेट संबंधित कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
सक्सेना ने जमानतियों के संदर्भ में BNSS की धारा 140 का उल्लेख करते हुए बताया कि मजिस्ट्रेट को उनकी पात्रता और विश्वसनीयता की जांच करने का अधिकार है। यदि कोई जमानती आवश्यक जानकारी देने या अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करने में विफल रहता है, तो उसे अस्वीकार किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निवारक कार्यवाही के तहत हिरासत की अधिकतम अवधि और उसके औचित्य का आकलन लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार किया जाना चाहिए। केवल जमानती उपलब्ध नहीं होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखना उचित नहीं होगा।
बचाव पक्ष ने उठाए मौलिक अधिकार और निष्पक्षता के सवाल
सीजेपी नेताओं के वकील अभिष्ट हेला ने पुलिस की भूमिका और कार्यवाही की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि पुलिस अधिकारी ही शिकायत दर्ज कर रहे हैं, वही संबंधित लोगों को हिरासत में ले रहे हैं और फिर उन्हें ऐसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर रहे हैं, जो पुलिस विभाग से जुड़ा अधिकारी होता है।
हेला ने यह भी दलील दी कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। उनके अनुसार, पीस बॉन्ड के उल्लंघन का निष्कर्ष निकालने के लिए यह देखना जरूरी है कि वास्तव में सार्वजनिक शांति को खतरा पहुंचा था या नहीं।
बचाव पक्ष का कहना है कि जिस स्थान पर कथित प्रदर्शन हुआ, वहां आम लोगों की मौजूदगी और शांति भंग होने की वास्तविक स्थिति जैसे तथ्यों की भी जांच की जानी चाहिए।
हालांकि, इन दलीलों पर अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत की समीक्षा और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

अभिजीत दीपके की रिहाई और दो अलग-अलग फैसलों का सवाल
एक ही राजनीतिक संगठन से जुड़े तीन लोगों में से अभिजीत दीपके की रिहाई और रांका तथा दास की हिरासत जारी रहने से भी सवाल उठे हैं।
वकील निपुण सक्सेना के मुताबिक, निवारक कार्यवाही में मजिस्ट्रेट परिस्थितियों के आधार पर निजी मुचलके या जमानतियों की शर्तें तय कर सकता है। उनके अनुमान के अनुसार, दीपके को नए निजी मुचलके पर रिहा किया गया हो सकता है, जबकि अन्य दोनों के मामलों में जमानतियों की स्वीकार्यता का प्रश्न सामने आया।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने आरोप लगाया है कि तीनों मामलों में जमानतियों के सत्यापन को लेकर समान दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया। वकील हेला के अनुसार, रांका और दास की ओर से पेश किए गए कई जमानतियों से पूछताछ के बाद उन्हें अस्वीकार कर दिया गया, जबकि दीपके के मामले में ऐसी ही प्रक्रिया दिखाई नहीं दी।
यह आरोप और इसके पीछे दिए गए तर्क अभी न्यायिक समीक्षा का विषय हैं।
आगे क्या हो सकता है?
दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण अदालत की सुनवाई होगी। वहां बचाव पक्ष हिरासत बढ़ाने के आदेश, पीस बॉन्ड के कथित उल्लंघन और जमानतियों को अस्वीकार किए जाने के आधारों पर सवाल उठा सकता है।
इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह है कि सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली निवारक शक्तियों का प्रयोग किन परिस्थितियों में उचित है और नागरिकों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार के साथ उनका संतुलन कैसे बनाया जाए।
अंतिम निर्णय में संबंधित आदेशों, पुलिस के दावों, बचाव पक्ष की दलीलों और लागू कानून के प्रावधानों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। जब तक अदालत इन मुद्दों पर फैसला नहीं सुनाती, तब तक आरोपों और बचाव पक्ष के तर्कों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

